भारत में खद्दर के कपड़े का प्रचलन 20वीं सदी की शुरुआत में हुआ, और इसका प्रमुख कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम था। खद्दर, जिसे खादी भी कहा जाता है, एक हाथ से बुना हुआ कपड़ा है, जिसे सूत से बनाया जाता है। इसके प्रचलन की कहानी महात्मा गांधी से गहराई से जुड़ी है, जिन्होंने इसे स्वदेशी आंदोलन के प्रतीक के रूप में अपनाया।
महात्मा गांधी ने भारत लौटने के बाद देखा कि ब्रिटिश शासन के कारण भारतीय कुटीर उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हो रहे थे। अंग्रेजी कपड़ों का बहिष्कार करने और भारतीय कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए उन्होंने खद्दर को अपनाने और प्रोत्साहित करने का आह्वान किया। उन्होंने चरखे का इस्तेमाल करते हुए कपास की कताई को आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता का प्रतीक बनाया।
गांधी जी का मानना था कि खद्दर केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि भारतीय स्वाभिमान और स्वावलंबन का प्रतीक है। उन्होंने इसे ग्रामीण भारत में रोजगार सृजन और आर्थिक स्वतंत्रता के साधन के रूप में देखा। खादी पहनने का उद्देश्य विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करना और भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना था।
इस आंदोलन ने भारतीय समाज के सभी वर्गों में खादी पहनने की प्रवृत्ति को जन्म दिया। खादी और खद्दर का उपयोग न केवल स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश विरोध का प्रतीक बना, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी बन गया।

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आज भी खद्दर का महत्व बना हुआ है, और इसे भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्थन देने और पर्यावरण के अनुकूल कपड़ों के रूप में सराहा जाता है। इस प्रकार, खद्दर का प्रचलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और स्वदेशी आंदोलन के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में शुरू हुआ और आज भी भारतीय परिधान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
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