एजेंसी/इस्लामाबाद| Minority Persecution In Pakistan – पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। भले ही पाकिस्तान का संविधान अल्पसंख्यकों को समानता और सुरक्षा की गारंटी देता हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में सिख, हिंदू, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को लगातार व्यवस्थागत भेदभाव, भीड़ हिंसा, और न्यायिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।
इस रिपोर्ट में पेशावर के सिख कारोबारी गुरविंदर सिंह का मामला प्रमुखता से उठाया गया है। वर्ष 2022-23 के बीच उनके मुस्लिम साझेदारों ने उनसे करीब 7.5 करोड़ पाकिस्तानी रुपये की धोखाधड़ी की। एफआईआर दर्ज कराने के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिला। ट्रायल कोर्ट, सेशंस कोर्ट और पेशावर हाईकोर्ट से पक्ष में फैसला आने के बावजूद आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं। गुरविंदर सिंह का मानना है कि उनकी शिकायत पर निष्क्रियता केवल इसलिए है क्योंकि वे एक सिख अल्पसंख्यक हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सिख महिलाओं को अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और जबरन विवाह जैसी भयावह स्थितियों का सामना करना पड़ता है। जगजीत कौर का 2019 का मामला इसका उदाहरण है, जिन्हें बंदूक की नोक पर अगवा कर इस्लाम कबूल करवाया गया और न्यायपालिका ने अपहरणकर्ता के पक्ष में झुकाव दिखाया।
सिख पुरुषों को भी मौखिक और शारीरिक उत्पीड़न, लक्षित हत्याओं और संपत्ति हड़पने जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ता है। 2023 में पेशावर में दयाल सिंह और मनमोहन सिंह की हत्या ने पूरे समुदाय को हिला दिया।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि ईशनिंदा कानूनों का दुरुपयोग और भीड़ हिंसा का इस्तेमाल अक्सर अल्पसंख्यकों की जमीन और संपत्ति पर कब्जा करने के लिए किया जाता है। गुरुद्वारों और धार्मिक स्थलों पर हमले आम हो गए हैं। 2020 में ननकाना साहिब स्थित गुरुद्वारा जन्मस्थान पर भीड़ द्वारा किया गया हमला इसका प्रमाण है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट करता है कि जब तक पाकिस्तान अपनी कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों के प्रति व्याप्त पूर्वाग्रहों को दूर नहीं करता, तब तक उसके संवैधानिक वादे केवल खोखले शब्द ही रहेंगे। सुधार के लिए स्वतंत्र जांच, अदालती आदेशों का त्वरित क्रियान्वयन, पक्षपाती अधिकारियों की जवाबदेही और ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग पर रोक आवश्यक है।

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