एजेंसी/ढाका| HRCBM human rights report-बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या और बीच सड़क पर पेड़ से बांधकर जलाने की घटना ने दुनिया भर में आक्रोश पैदा कर दिया है। यह घटना अकेली नहीं है, बल्कि एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है जिसे बांग्लादेशी मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (HRCBM) ने अपनी रिपोर्ट में उजागर किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, ईशनिंदा के आरोप अब अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का हथियार बन चुके हैं। जनवरी से नवंबर 2025 के बीच देश के 32 जिलों में ईशनिंदा से जुड़ी 73 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें से केवल 40 मामलों में पुलिस ने केस दर्ज किया। संगठन का कहना है कि इन आरोपों का इस्तेमाल धार्मिक आस्था की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि जमीन कब्जाने, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा खत्म करने और निजी रंजिश निकालने के लिए किया जा रहा है।
विशेष रूप से अल्पसंख्यक युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है। उन्हें झूठे आरोपों में फंसाकर स्कूल-कॉलेजों से निकाला जाता है, जिससे उनका भविष्य बर्बाद हो जाए। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सोशल मीडिया इन हमलों का प्रमुख हथियार बन गया है। फर्जी पोस्ट, हैक किए गए अकाउंट और छेड़छाड़ किए गए स्क्रीनशॉट के जरिए भीड़ को भड़काया जाता है।
एक उदाहरण में 69 वर्षीय नाई परेश चंद्र शील को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि उन्होंने एक मौलवी से बाल काटने के लिए 10 टका मांगे। मौलवी ने बदले में ईशनिंदा का आरोप लगाया और भीड़ ने उनकी दुकान को तहस-नहस कर दिया। एक अन्य मामले में फेसबुक पोस्ट के बहाने पूरे हिंदू गांवों को निशाना बनाया गया, जहां 400 से ज्यादा घरों में लूटपाट और आगजनी की गई।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कई मामलों में पीड़ितों को सरेआम जिंदा जलाया गया, जबकि असली दोषी खुलेआम घूमते रहे। पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं, क्योंकि वह अक्सर पीड़ितों को ही गिरफ्तार करती है।
HRCBM ने चेताया है कि यह महज छिटपुट घटनाएं नहीं, बल्कि अल्पसंख्यकों को डराकर पलायन के लिए मजबूर करने की साजिश है। हजारों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो चुके हैं। यह रिपोर्ट बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे की गंभीर चेतावनी है।

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