एजेंसी/कोयंबटूर| Human Wildlife Conflict Tamil Nadu – तमिलनाडु में इंसान और जंगली जानवरों के बीच बढ़ता टकराव एक गंभीर मानवीय और पर्यावरणीय संकट का रूप लेता जा रहा है। पिछले दस वर्षों में राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण 685 लोगों की मौत हुई है, जिनमें अकेले पिछले एक साल में 43 मौतें शामिल हैं। यह आंकड़े वन विभाग और आम जनता दोनों के लिए चिंता का विषय बन गए हैं।
कोयंबटूर में आयोजित एक उच्च-स्तरीय सेमिनार में अनामलाई टाइगर रिजर्व (एटीआर) के मुख्य वन संरक्षक और क्षेत्र निदेशक डी. वेंकटेश ने इस संकट के तकनीकी और पारिस्थितिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब तक जंगलों के किनारों पर रहने वाले स्थानीय समुदाय सक्रिय रूप से संरक्षण प्रयासों में शामिल नहीं होंगे, तब तक इन टकरावों को कम करना असंभव है। पश्चिमी घाट से सटे जिलों जैसे तेनकासी, विरुधुनगर, कोयंबटूर, तिरुपुर, थेनी, सेलम, धर्मपुरी और कृष्णागिरी में संघर्ष की घटनाएं सबसे अधिक दर्ज की जा रही हैं।
वेंकटेश ने बताया कि राज्य के कई वन क्षेत्र ऊपर से हरे-भरे दिखते हैं, लेकिन वास्तव में वे हरे रेगिस्तान में बदल चुके हैं। इसका कारण विदेशी पौधों की प्रजातियों का तेजी से फैलना है, जो स्थानीय वन्यजीवों को भोजन और उचित आवास नहीं दे पाते। इस पारिस्थितिक गिरावट ने वन्यजीवों के पारंपरिक आवागमन मार्गों को बाधित कर दिया है। उदाहरण के तौर पर, हाथी जो पहले केवल कोडाइकनाल के बेरिजम इलाके तक सीमित थे, अब भोजन की तलाश में डिंडीगुल की सीमाओं तक पहुंच रहे हैं।
विशेषज्ञों ने माना कि जंगल की जमीन पर बढ़ता अतिक्रमण, जानवरों के रास्तों पर पक्की सड़कों का निर्माण और नकदी फसलों की खेती का विस्तार इस समस्या के मुख्य कारण हैं। मानव हस्तक्षेप ने वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार को बदल दिया है, जिससे अचानक मुठभेड़ की घटनाएं और अधिक घातक हो गई हैं।
वन विभाग इस संघर्ष को कम करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम और हाथियों की रीयल-टाइम निगरानी जैसे तकनीकी उपाय अपना रहा है, ताकि संवेदनशील गांवों को समय रहते चेतावनी दी जा सके। हालांकि, प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्रीनिवास आर. रेड्डी ने जोर देकर कहा कि ये प्रयास तभी सफल होंगे जब स्थानीय लोग वन विभाग की सलाह का पालन करेंगे और वनों के मूल स्वरूप को बचाने में सहयोग देंगे।
भविष्य में इस संकट को टालने के लिए इंसानों और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व की रणनीति ही एकमात्र स्थायी मार्ग दिखाई देता है।

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